किसान की मौत पर भारतीय किसान संघ का फूटा गुस्सा: प्रशासनिक हत्या का आरोप

कोटा / इटावा। राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में एक किसान की दुखद मृत्यु ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। भारतीय किसान संघ (BKS) ने इस घटना पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे ‘प्रशासनिक हत्या’ करार दिया है। संघ का स्पष्ट आरोप है कि किसान की मौत केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की लापरवाही, उपज खरीद में बरती गई अनियमितताओं और कर्ज के बोझ तले दबे अन्नदाता की चीख को अनसुना करने का परिणाम है। इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र के किसानों में भारी आक्रोश व्याप्त है और स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।

प्रशासनिक संवेदनहीनता और खरीद प्रक्रिया पर सवाल

भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि यदि समय रहते प्रशासन जाग जाता, तो एक किसान परिवार का सहारा नहीं उजड़ता। संगठन ने इसे व्यवस्था की विफलता बताते हुए कहा कि किसान बार-बार अपनी समस्याओं को लेकर अधिकारियों के चक्कर काट रहे थे, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। विशेष रूप से मंडियों में उपज खरीद के दौरान गुणवत्ता मानकों (Quality Norms) के नाम पर किसानों को परेशान किया जाना इस घटना का मुख्य ट्रिगर माना जा रहा है।

किसान नेताओं का आरोप: बार-बार की गई थी शिकायत

भारतीय किसान संघ के संभाग अध्यक्ष गिरीराज चौधरी, जिला अध्यक्ष जगदीश कलमंडा, और युवा नेता धनराज पारेता ने बताया कि संगठन ने पहले ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, जिला कलेक्टर और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री को लिखित में समस्याओं से अवगत कराया था। किसान नेताओं का कहना है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि यदि उपज खरीद में लचीलापन नहीं लाया गया, तो किसान मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाएगा। दुर्भाग्यवश, जमीनी स्तर पर अधिकारियों ने इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया।

मौसम और कर्ज के दोहरे संकट में फंसा अन्नदाता

हाड़ौती का किसान इस समय दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ बेमौसम बारिश और बदलते मौसम ने फसलों को नुकसान पहुँचाया है, वहीं दूसरी ओर खेती की बढ़ती लागत और बैंक कर्ज ने किसान की कमर तोड़ दी है। पदाधिकारियों ने कहा कि जब किसान अपनी बची-कुची फसल लेकर मंडी पहुँचता है, तो वहाँ एफसीआई (FCI) और अन्य खरीद एजेंसियां नमी और गुणवत्ता के बहाने फसल खरीदने से इनकार कर देती हैं। यही मानसिक दबाव अंततः किसान की मौत का कारण बना।

सरकारी निर्देशों की धज्जियां उड़ा रहे अधिकारी

संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख आशीष मेहता और उमाशंकर नागर ने आरोप लगाया कि सरकारी तंत्र निजी कंपनियों और ठेकेदारों की मनमानी के आगे नतमस्तक है। सरकार की ओर से स्पष्ट निर्देश थे कि खरीद प्रक्रिया में किसानों को राहत दी जाए, लेकिन स्थानीय प्रशासन और खरीद एजेंसियों ने इन निर्देशों को फाइलों में ही दबाए रखा। किसानों का आरोप है कि जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा की जा रही हैं जिससे किसान ओने-पौने दाम पर व्यापारियों को फसल बेचने पर मजबूर हो जाए।

उच्च स्तरीय जांच और मुआवजे की मांग

भारतीय किसान संघ ने इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। संगठन की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

  • दोषी अधिकारियों और खरीद एजेंसियों के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज की जाए।
  • मृतक किसान के परिवार को उचित आर्थिक मुआवजा और एक सदस्य को सरकारी सहायता प्रदान की जाए।
  • उपज खरीद के नियमों में तुरंत ढील दी जाए ताकि अन्य किसानों को इस स्थिति से बचाया जा सके।

आंदोलन की चेतावनी: चुप नहीं बैठेगा किसान

घटना पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए किसान नेताओं ने प्रशासन को अंतिम चेतावनी दी है। जिला मंत्री रूपनारायण यादव और अन्य पदाधिकारियों ने संकल्प लिया है कि यदि जल्द ही न्याय नहीं मिला, तो पूरे संभाग में उग्र आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसान अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगा, उसे ठोस कार्रवाई चाहिए। इस दौरान खातोली, पीपल्दा और अन्य तहसीलों के दर्जनों कार्यकर्ता एकजुट होकर न्याय की मांग कर रहे हैं।

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